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बड़े घर की लड़की

बड़े घर की लड़की  अब वह भी खेल सकती है भाई के सुंदर खिलौनों से  अब वह भी पढ़ सकती है भाई के संग महंगे स्कूल में  अब वह भी खुलकर हँस सकती है लड़कों की तरह  वह देखने जा सकती है दोस्तों के संग सिनेमा  वह जा सकती है अब काॅलेज के पिकनिक टुअर पर  वह रह सकती है दूर किसी महानगरीय हाॅस्टल में  वह धड़ल्ले इस्तेमाल कर सकती है फेसबुक, ह्वाट्सएप और ट्विटर  वह मस्ती में गा  और नाच सकती है फैमिली पार्टी में  वह पहन सकती है स्कर्ट ,जीन्स और टाॅप वह माँ - बाप से दोस्तों की तरह कर सकती है बातें  वह देख सकती है अनंत आसमान में उड़ने के ख़्वाब  इतनी सारी आज़ादियाँ तो हैं बड़े घर की लड़की  को  बस जीवनसाथी चुनने का अधिकार तो रहने दो  इज़्ज़त-प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी ऊँचे खानदान की  वैसे सब जानते हैं कि साँस लेने की तरह ही  लिखा है स्वेच्छा से विवाह का अधिकार भी  मानवाधिकार के सबसे बड़े दस्तावेज में ! ---------------------------------------------------

विदा होती बेटियाँ

विदा होती बेटियाँ  रोती हैं सब बेटियाँ  जब लाँघ कर देहरी मायके की   एक नई दुनिया की ओर  कदम रखती हैं हौले से  सब की सब नहीं होती हैं  सबसे अमीर पिता की संतान  सबके घर में नहीं होती है  कोई कामधेनु गाय  सबके घर नहीं होते  आलीशान राजमहल  सबके पास नहीं आता  सफेद घोड़े पर सवार सुंदर राजकुमार  फिर भी वे तैर लेती हैं कभी - कभी  ख़्वाबों के स्वीमिंग पुल में  गा लेती हैं उम्मीदों के गीत  सुंदर गार्डेन की धूप - छाँव में  सिनेमा के काल्पनिक गीतों को याद कर  रिश्ता तय होने के बाद से ही  कभी हँसती हैं  कभी रोती हैं अचानक  कभी भविष्य को ताकती हैं  कभी अतीत को झाँकती हैं  रात्रि के एकांत में प्रायः उदास हो जाती हैं बेटियाँ - कि न जाने कैसे चुकेगा पिता का क़र्ज़ नया कि कौन रखेगा  दिन- ब -दिन पृथ्वी की तरह बूढ़ाती अपने वदन पर   नई बीमारियों की लिस्ट जोड़ रही  स्नेहिल बरगद की छाँव-सी माँ का ख़याल  ...

मिट्ठू-राग

मिट्ठू - राग ------------------ यह उन दिनों की बात है  जब नहीं था इंटरनेट  न ही स्मार्ट फोन  और न ही सोशल मीडिया का विस्तृत फ़लक  तब भी स्कूल जाती थीं लड़कियाँ  सुबह सवेरे काॅलेज के लिए निकल पड़ती थीं युवतियाँ   और घर की चिंता सर पर बांधे  दफ़्तर की राह चल देती थीं कामकाजी स्त्रियाँ  उन दिनों भी बस या ऑटो में घूमती थी कुछ गिद्ध निगाहें  टटोलती थीं वहशी उंगलियाँ गोश्त उम्र के फासले मिट जाते थे  नए दानवों के साथ वृद्ध राक्षसराज भी होते थे शिकारी  लेकिन साहसी लड़कियाँ जड़ देती थी प्रतिरोध के तमाचे  थोबड़ों पर उग आते थे नाज़ुक उंगलियों के अनदेखे निशान  काॅलेजों में भी ताक में बैठे होते थे नुकीले पंजे वाले भेड़िए  जो दिलवाते थे टाॅपर होने का तमगा  कुछ आसमानी लड़कियाँ शिकार हुईं  पर कई स्वाभिमानियों की इंकार हुई  सच है कि  दफ़्तरों के केबिन भी कम नहीं थे इस्पाती पिंजड़ों से  कुछ ऊँची उड़ान के लिए लाचार हुईं  कुछ ने  नहीं रखा अपनी आ...

भेड़ियों का देश

भेड़ियों का देश  उनकी चीखें अब भी सुनाई दे रही हैं जो दफ़न कर दी गई अपने ही आश्रय में उनके आँसू अब भी दे रहे ज़ख़्मों की गवाही जो बची रह गई हैं ज़िंदा लाशें उन्होंने शायद सुनी नहीं होंगी आततायी राक्षसराज रावण की कहानी जिसने  क़ैद में भी रखा था सुरक्षित अपहृत कर लाई गई सीता उन्होंने नहीं देखी होंगी शायद पुरानी फ़िल्में जिनमें कोठे पर तोड़ कर लाई गई कलियों का भी फूल बनने तक होता था इंतज़ार उन्होंने शायद सुनी होंगी खूंखार भेड़ियों की कहानी पर अपने ही समक्ष देखा होगा पहली बार वे चिल्लाई होंगी , फड़फड़ाई होंगी पिंजड़े में देखकर उनके वहशी पंजे पर महिला दलालों को भी रहम न आई होगी काश इस वीभत्स हक़ीक़त का नाम बस मुज़फ्फ़रपुर ही होता पर अफ़सोस..... ओ ' धर्मपत्नी और लाडली पुत्री  ' जो डाल रही हो पर्दा अपने ही खूनी मुखिया भेड़िये के कुकर्मों पर खुश हो लो कि- वैसे ही ख़ौफ़नाक भेड़ियों से भर गया है यह पूरा देश देवियों के नाम पर भी सज रही हैं मंडियाँ और हाँ तुम्हारी तरह वे बहुत कुलीन खानदान की नहीं बेटियाँ पर इतना तो जानती होगी तुम भी कि भेड़ियों के ल...

वाटरवाइफ़

          वाटरवाइफ़  ************** ओ पानीबाई उर्फ वाटरवाइफ़  तुम्हारी आँखों में भी तो छलककर आ जाता होगा पानी कभी -कभी  या तुमने इसे अपनी नियति मान  सारे पानी को सुखा लिया है  रख अपने कलेजे पर पत्थर  सुना है मैंने  तुम्हारे अनोखे जीवन के बारे में जबसे  तू क्या सोचती होगी  आते -जाते लंबे रस्ते में  यही सोच रही तबसे  या सहेलियों के संग  अपने दुख की गठरी तुम  कुछ हल्का कर लेती होगी  देखो न कितने ज़ख़्म भरे पड़े हैं  धरती के भी अधेड़ वदन पर  काटने को तैयार हैं सरकारी कुल्हाड़ियाँ राजधानी में सोलह हज़ार दरख़्त  उन दरख़्तों  की भी सुंदर कहानी रही होगी  कुछ हँसते होठों और गीली आँखों की ज़िंदगानी होगी  विकास के नाम पर उनकी भी अब कुर्बानी होगी  सोचकर अक्सर हैरान होती हूँ मैं  यह विकास नामक एलियन -सा जीव  तुम्हारे गाँव जाकर कभी झाँकता क्यों नहीं  दूर -दराज के कुओं -दरियाओं को  तुम्हारे पास बुलाता क्यों नहीं ...

वीडियो की बात

मित्रों,नमस्कार । एक लंबे अंतराल बाद यहाँ आना संभव हो पाया है । दरअसल आजकल अपनी बातों के संप्रेषण के कई माध्यम हैं ।समय के साथ साथ जैसे प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ़ लोगों का रूख हुआ ,उसी तरह अब पढने की बजाय कुछ लोग सुनने -देखने में ज़्यादा रुचि लेते हैं ।विदेशों की तरह भारत में भी वीडियो का प्रचलन बढ़ रहा है । मैं भी अब इस अधिक संप्रेषणीय माध्यम के सहारे अपनी बात अधिक लोगों तक पहुँचाने की छोटी कोशिश में लगी हूँ । कुछ मित्रों ने इसे सराहा है । आप भी इसे देखें- परखें।पसंद आए तो लाइक करें ,शेयर करें । मैंने यू ट्यूब पर एक चैनल बनाया है जिसमें अपनी अभिरुचि के अनुरूप साहित्य ,कला एवं प्रकृति के संयोजन का अपने सीमित साधनों में एक छोटा सा प्रयास है ।आप इसे सब्सक्राइब करेंगे तो मुझे प्रोत्साहन मिलेगा । लिक है : https://www.youtube.com/channel/UCwKPATswcN0gfHA0LYaxyg

नृशंस से अधिक

नृशंस से अधिक .....  इस बार भेड़िये गाँव से जंगल की ओर आए  नोच-नोचकर बोटियाँ मासूम गुड़िया के खा गए  भगवान के घर में  लगाए माथे पर कलंक -टीका  भजन गाते हुए अधम  पापी नृशंसता को पीछे छोड़ आए  कभी किया होगा  नवरात्रि में कन्या-पूजन  उस देवी को कैसे  सहज दलन कर आए  कैसे हैं वे भेड़िये अपने ही पुत्रों के नाखून चमका रहे  संग मिलकर अनवरत  बोटियाँ खाना सिखला रहे  सुन लें पापी वे  न तिरंगा का  न औरत का  है कोई मज़हब होता  वह नारी नहीं हो सकती  जिसकी रूह न काँपी होगी  भेड़ियों की ऐसी दास्तान  पहले किसी ने न सुनी होगी  सियासत की अगर मज़बूरी न हो  उस मासूम का नाम भी 'निर्भया ' रख दो  सज़ा ऐसी मुकर्रर कर दो  हर भेड़िये की आँखें बन जाएं पत्थर  ! @कठुआ  -सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना 

कविता की ज़मीन

"विश्व कविता दिवस " की हार्दिक शुभकामनाएं सभी मित्रों को ..... तब आठवीं कक्षा की छात्रा थी .. अभी उस स्कूल में नई नई थी मैं ...अचानक एक दिन घोषणा हुई कि स्कूल में कविता लिखने की प्रतियोगिता है ......पता नहीं क्यों इस घोषणा ने मन बांध लिया ....शायद घर में पिता को लिखते देखते आई थी .....प्रशासनिक सेवा में होने के बावजूद पिताजी की साहित्यिक अभिरुचि थी और स्थानीय पत्र - पत्रिकाओं में छपते भी रहते थे .....जब से मैंने होश संभाला था ,घर में खुद को साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच घिरा पाया ....धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान ,कादंबिनी ,नवनीत ,सारिका,हंस जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं की नई- पुरानी प्रतियों के अलावा दिनमान और रविवार के बहुत पुराने अंकों के पन्ने पलटते हुए पता ही न चला कि कब मैं खुद शब्दों की चितेरी बनने की नींव रख चुकी थी...... हाँ ,तो स्कूल की घोषणा मेरे  लिए एक नया रास्ता  गढ़ रही थी हालांकि इसकी कोई मंजिल नहीं थी  .....इससे पहले सिर्फ एक बार कविता लिखने की बचकाना कोशिश की थी ...संयोग से उस दिन एक खाली पीरियड भी हाथ आ गया ....बस फिर क्या ....ताना -बाना शुरू  .......

प्रेम अभी क़त्लखाने में क़ैद निहत्था अहसास है

प्रेम अभी क़त्लखाने में क़ैद निहत्था अहसास है कि खिलना था सुंदर फूलों को जहाँ वह ठूंठ बनकर कुरूप खड़ा है तितलियाँ इस भयानक हादसे की शिकार हैं पत्थर मार रहे हैं बच्चे उनके पागलपन पर कोई रूदाली गा रहा है रूक रूक कर कोयलिया का भी गला रुंध गया है शायद तोड़े जा रहे हैं प्रेम के मंदिर डायनामाइट से घृणा को मातृभूमि से प्रेम का पर्यायवाची शब्द गढ़ा जा चुका है नैतिकता का मुखौटा चमक रहा है अनैतिकता के हर रावणी चेहरे पर लाल रंग नफ़रत की चाशनी में गाढ़ा होकर काला पड़ गया है बिल्कुल टूटे सूखे गुलाब की बेजान पंखुड़ियों की तरह ऐसे में मत कहो कि लिखो एक प्रेम कविता हमारे हाथों में तो नुकीले खंजर छुपे हैं कलम की शक्ल में ये प्रतिशोध के लोकप्रिय   हथियार हैं हमें डर है कि लिखना चाहें एक अदद प्रेम कविता कोई वीभत्स क़त्ल न हो जाए कठपुतली बनी उंगलियों से कि हर क़दम हमारा सीसीटीवी कैमरे की गहन निगरानी में है हँसना भी असंभव है प्रेमवाली नैसर्गिक हँसी और नौटंकी सबके वश की बात नहीं है बहुत शिद्दत से चाहते हैं सब परिंदे प्रेम करना कि वसंतोत्सव मना रहा है बाज़ार चीखकर फिर भ...

आधी आबादी का नव वर्ष

थोड़े से   रंग हों थोड़ा से ख़्वाब हों बिखरे तो उदास न हो टूटे तो   आवाज़ न हो.... इस ब्लॉग के सभी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं  ! हालांकि हर दिन नया होता है हर रात नई होती है ....हर छोटा सा पल भी नया ही होता है ....जब सप्ताह का प्रारंभ सोमवार से ....दिन का प्रारंभ सुबह से होता है ....फिर वर्ष का प्रारंभ भी एक न एक दिन तय होना ज़रूरी होता है ....ग्लोबल दुनिया ने पहली जनवरी को यह तोहफा दिया है ....और इस तोहफे के परस्पर विनिमय से कोई अलग नहीं रह पाता है ....यानी साल के पहले दिन की खुशी मनाकर तरोताज़ा हो जाना किसी धार्मिक गुलामी का प्रतीक नहीं है . ऐसा नहीं कि हर दुआ... हर शुभकामना पूरी हो ...लेकिन इस बहाने सकारात्मकता का प्रवाह  होना जीवन के लिए शुभ ही तो है ....अब देखिए न ..ऊपर की तस्वीर का गुलाब ...नर्सरी से घर लाने के बाद हाल ही में  पहली बार इसमें कली लगी ....और मुझे इसे देख एक हफ्ते से ऐसा लग रहा था कि यह नए साल का मेरे लिए उपहार होगा ...आज यह गुलाब पूरा तो  नहीं खिल पाया है.. शायद धूप की कुछ कमी रह गई थी इन दिनों...... पर...

वह भी एक जश्न था .........

वह भी एक जश्न था ........... *************************** वह तिल -तिल कर कैसे जली होगी  क्या वह कोई दीवानी परवाना  थी  जो दूर किसी शमा की तरफ़ खिंंची हुई  खुद -ब -खुद यूंं ही बेसुध  चली गई थी   सुना है ,होता था उनका सोलहो श्रृंगार  गाए जाते थे वैसे ही सभी मंगलाचार  ज्यों उल्लासित दुल्हन का हो रहा हो ब्याह  जा रही हो पहली बार प्रियतम के द्वार  बज रहे थे ज़ोर से ढोल -नगाड़े -नौबत लगातार   पंडित कर रहे थे उच्च ध्वनि में मंत्रोच्चार  आग की ऊँची लपटों और धुएँ से सजा था काला आसमान  अंधा -बहरा हुआ था मौजूद वहाँ हर इंसान  तिल -तिल कर जलकर वह चीखी थी  कई बार  मृत पति की सेज पर धकेली गई थी जो लाचार  बाहर तैनात थे लठैत की शक्ल में कसाई मूंछदार  भागती हिरणी को अंदर खदेड़ने को मुश्तैदी से तैयार  वह जलती रही झुलसती रही ,रिश्ते हुए तार - तार  पुत्र के शोक में डूबे थे ,पर वधू थी दूजे घर की नार  चमक उठे थे उस पल कई गर्वित राजपूती भाल  ...

जींस - मोबाइल, ना बाबा न !

जींस - मोबाइल  ....ना बाबा ना ! *************************** ना बाबा ना  हम हैं  बड़ी संस्कारी लड़कियाँ   पिता के माथे की लाज बेटियाँ  हम वही अपनाएंगी  जो तुम रटाओगे  तुम ठहरे शिक्षक बड़े ज्ञानी  माँओं  और दादियों ने पहनी थी साड़ी  अब हमारी  है बारी   साड़ियों ने की है इतनी मेहरबानी   द्रौपदी की लाज बचाई या उतारी  पता नहीं फिर भी सुंदर कहानी   मोबाइल भी नहीं रखेंगे  वरना बिगड़ जाएंगी हम   बस लड़कों को बिगड़ने दो  क्योंकि यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है  और देखो न अगर मोबाइल रख लिया  अपने पास  तो टूट जाएगा तुम्हारे द्वारा फैलाया गया बहुत सुन्दर भ्रम  कि तुम्हारी स्मृतियों और धर्मग्रंथों  के अनुपालन वाली दुनिया बहुत सुन्दर है  और हम देख लेंगी तुम्हारे जानवरों के घृणित वीभत्स कुकर्म   कि  एक साल की गुड़िया नहीं महफ़ूज इस नरक में  और शर्म -लाज से बहुत ऊपर उठ चुकी सौ साल की बूढ़ी औरत...

नहीं ये फ़ाहियानों और ह्वेनसांगों का वृतांत

नहीं यह फ़ाहियानों और ह्वेनसांगों का वृतांत *********************** सुना है  कि अपने देश से खत्म हो गया है  जातिवाद, भेदभाव और छुआछूत का कहर  सब मिलजुल के रहते हैं हर गाँव -शहर  सच है क्या ,नागरिकों  ऐसी कितनी सावित्रियाँ  मारी जाती हैं हर रोज़  कभी मानसिक तौर पर  कभी शारीरिक रूप से  ख़बर भी नहीं बन पाती  कि एक अजन्मा बच्चा भी  मारा गया है असमय  सदियों से नफ़रत की धधकती आग में  हार गया है कोई अभिमन्यु कहीं  प्रथम चक्रव्यूह के आने से पहले  मुझे पता नहीं क्यों  स्मरण आ रहा है  वट सावित्री व्रत  और वट वृक्ष के चारों ओर  परिक्रमा करती  सावित्री और सत्यवान को  बड़ी निष्ठा से पूजती औरतें  और खोज रही हूँ उनमें  उस हत्यारी ठकुराइन का चेहरा  कि कभी मांगा होगा उसने भी  सदा के लिए अपने पति का साथ  और अपने वीर पुत्र का सौभाग्य  फिर स्मरण हो आए हैं अनायास  प्राचीन इतिहास के वे अध्याय कि जानती ...

माथे पे सिंदूरी सूरत

माथे पे सिंदूरी सूरत ....... आज देश का एक बड़ा तबका भुखमरी, ग़रीबी, बेकारी ,साम्प्रदायिक व जातीय हिंसा जैसी समस्याओं से जूझ रहा है.... ऐसे में भी कुछ लोगों का शगल बन चुका है ...बेमतलब की बातों को हवा देकर नारी मुक्ति का नाम देना ....आश्चर्य तो तब होता है जब पुरुषों के हस्तक्षेप पर उन्हें  दुत्कारकर मेरी मर्जी कहने वाली तथाकथित आधुनिक नारीवादी महिलाएं भी इस मुद्दे को गंभीर बना रही हैं ...सोशल मीडिया में संग्राम छिड़ गया है .....सिंदूर के मुद्दे पर .....भ्रूण हत्या से लेकर स्त्री जाति की  शिक्षा और आत्मनिर्भरता के मुद्दे उनके लिए बासी पड़ चुके हैं .....अब हाॅट टाॅपिक है पर्व -त्योहारों का विरोध और बस इसे  स्त्रियों की गुलामी से जोड़ना ....इस तरह प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़ना ......सोशल मीडिया की इस भूमिका को देखकर निराशा होती है   हर पर्व त्योहार अंधविश्वास नहीं होता है ...न ही कट्टरपंथी तत्वों का प्रायोजित संस्कार ......हाँ,उसमें  दूरबीन लेकर विज्ञान की थ्योरी खोजेंगे तो निराशा ज़रूर हाथ लगेगी .....यह आस्था की बात होती है ... और यह आस्था एक दिन की बनी हु...

वो आँखें बोलती हैं

वो आँखें बोलती हैं ..... उन दिनों मैं चौथी कक्षा की छात्रा थी .....जब उस 31 साल की महान अदाकारा का निधन हुआ था .....उस वक़्त तक मैंने उनकी कुछ ही फ़िल्में देखी थी....' आखिर क्यों ' 'मंथन ' 'भींगी पलकें 'और 'मिर्च मसाला '......वो भी दूरदर्शन के सौजन्य से .....पर वे मुझ पर अमिट छाप छोड़ चुकी थीं.... इसलिए जब यह मनहूस ख़बर सुनी ....तो सहज विश्वास नहीं हुआ.....  बाद में धीरे - धीरे उनकी और भी फिल्में देखी .....और वे झकझोरती रहीं ....अपने दमदार अभिनय से.... 'मंथन 'फिल्म का दुग्ध क्रांति से संबंधित गाना "मेरो गाम काथा पारे ,जहाँ दूध की नदिया बाहे "टीवी पर अक्सर बजता रहा ....और वे हम सबकी नज़रों के सामने रहीं .... साँवली त्वचा का ऐसा जादू..... बोलती आँखों का ऐसा सम्मोहन ...राष्ट्रीय पुरस्कारों का दोहरा सम्मान ....एक प्रखर नारीवादी और मराठी समाचार-वाचिका से समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा के 80 अध्यायों पर अंकित सुनहरे नाम को श्रद्धांजलि .....हाँ ,स्मिता पाटिल !यूं तो लगभग सभी पुरानी अभिनेत्रियाँ मुझे प्रिय रही हैं.... पर आप इन सबसे अलग ह...

चीज़ ....माल ...या टनाटन !

चीज़ ....माल ....या टनाटन ! _______________________ बड़ा पाॅपुलर हुआ था एक फिल्मी गाना वो शायद नब्बे का दौर था 'तू चीज़ बड़ी है मस्त ' और कुछ मर्दों को मिल गया था जैसे सर्टिफ़िकेट लड़कियों और औरतों को चीज़ मानने का यह चीज़ 'चीज' से भी मुलायम होती थी जिसे आता नहीं था प्रतिकार करना सपेरे की धुन पर नागिन सी झूम जाती थी खयालों में ही सही किसी वशीकरण यंत्र का उम्दा विज्ञापन लगती थी फिर माॅल संस्कृति के आगमन पर वे विंडो शाॅपिंग का सेक्सी माल हो गईं अब टनाटन और टंच दिखने लगी हैं देश के सठियाए कर्णधारों को पर उन्हें क्या जो गढ़ते हैं संबोधन और अद्भुत विशेषण उन्होंने नहीं सुना कभी धड़कते सीनों का अरमान कभी देखी नहीं गौर से पंख कटे चिड़ियों की उड़ान कभी पूछा नहीं मसली गई कलियों का हाल कभी छोड़ा नहीं तितलियों को बाग में आज़ाद बस वे जानते हैं औरत का औरत होना औरत होना मने कठपुतली कला का ज़िंदा होना कहा हँसो तो हँसना कहा रो तो रोना ज़बान उसकी और संवाद अपना खूब सजाया फिर नचाया और मन को जीभर बहलाया जी भर गया तो नए चेहरे ले आया पुराने की जगह अक्स...

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ क्या नाम दूँ  तुम्हें  दुर्योधन,दुःशासन या  कलियुग का कुलनाशक  नाम देने से भी क्या फ़र्क पड़ता है  पत्थरों  पर कहाँ असर होता है    तुम्हें तो लज्जा कभी नहीं आती  देवी की आराधना तुमने भी की होगी  क्या माँगा होगा गिड़गिड़ाकर उसके चरणों में  धन -बल या फिर कोई छल  देखी तो कभी होगी अलबम में  अपनी माँ की जवानी की तस्वीर  क्या तुम्हें वह सूरत उस वक़्त नज़र नहीं आती  जब अपने आसान 'शिकार'  पर हमला करते हुए  लज्जा कभी नहीं आती   तुम्हारी भी कोई बहन कहीं  बंद कमरे की घुटन तजकर  हर शाम की सुहानी हवा में  थोड़ी देर  आज़ाद चिड़िया बन जाना चाहती होगी  क्या तुमने कतर दिए हैं उसके सफेद पंख या बाँध दी हैं बेड़ियाँ उसके नाज़ुक पाँवों में तुम्हें अपनी स्वच्छंदता को झूठी मर्दानगी बताते हुए  लज्जा कभी नहीं आती  सुना है कि खत्म हो रहे हैं जंगल  और खत्म हो रहे हैं...

चमकती रहे हिन्दी

हिन्दी दिवस की बहुत बधाई  सभी पाठक मित्रों को ....हिन्दीभाषी होने के कारण ही शायद मैं यहाँ हूँ और इतने व्यापक क्षेत्र तक अपनी बात पहुँचा पा रही हूँ। बहुत अच्छा लगता है अपनी बात कहने में अपनी मातृभाषा में .... यूँ तो मैं एक भोजपुरीभाषी क्षेत्र से संबंधित हूँ ....इसलिए हिन्दी पर इसका असर बिल्कुल स्वाभाविक है ...क्षेत्रीय बोलियाँ और भाषाएं हमारी हिन्दी के लिए ख़तरा नहीं जैसा कि आजकल कई विद्वान इस विवाद पर कमर कसे हुए हैं ....इससे हिन्दी और भी समृद्ध होती है और यह विविधता इसे बहुत सुंदर बनाती है ....शायद सचमुच की राष्ट्रभाषा की सारी ख़ूबसूरतियों को समेटे हुए ....  कुछ लोग हिन्दी को लेकर अधिक ही चिंतित हो जाते हैं .... पर अतिशुद्धतावाद का यह आग्रह ही इसकी नैया को डूबो भी सकता है क्योंकि यह अभी भी मंझधार में खड़ी है ....और बहुत दूर किनारे हैं ...कुछ लचीला रूख तो हो  ....कि सब इसकी मिठास को पहचान सकें न कि इसे अड़ियल खड़ूस मास्टरनी के रूप में दूर से ही देखकर भाग खड़े हों . कुछ लोग आज के दिन सवाल उठाते हैं कि अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभा...

कछुए के पाँव पे

कछुए के पाँव पे  सुना है  कोई मुझे जानता नहीं  कोई पहचानता नहीं  जैसे आ गई हूँ  अपने कुनबे से बिछड़कर  एक बिल्कुल नए इलाक़े में  तो किसने कहा था मुझसे  ले लो अल्पविराम  जहाँ छोटे -से अंतराल में  बदल जाती है पूरी दुनिया  कुचल देते हैं बेरहमी से  रेस के घोड़े  तो क्या  मैं नहीं तनिक शर्मिंदा हूँ  अभी भी मैं ज़िंदा हूँ  रेस के घोड़ों के बीच  कछुए के पाँव पे चलते हुए  सूरज के साथ टहलते हुए  ! सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना  *तस्वीर गूगल से साभार 

गर्व से कहो हम इंसान हैं ....काश !

गर्व से कहो हम इंसान हैं ....काश ! ********************* मैं ढूंढ रही थी  इस आभासी दुनिया में  इंसानियत का एक समूह  जिसके चेहरे पर न चमकता हो किसी कायस्थ, ब्राह्मण, राजपूत,बनिए  या दलित का  अति गर्वित - सा भाल  जिसके हुँकारित हाथों में नहीं हो चटक भगवा ध्वज या जिसकी अकड़ी हुई मीनार पर  नहीं लहरा रहा हो झूमकर  हरियाला मज़हबी झंडा  मेरी उँगलियाँ थककर  सो गईं गूगल पर सर्च करते करते  बीते कई दिनों से सोच रही हूँ मैं ही पागल या निरा नादान हूँ अब तो सांझा चूल्हों के किस्से पुराने हो गए लोग तब से अब तक कितने ही सयाने हो गए  नए नोटों पर मंगलयान इतराता हो तो क्या  हमारे गर्वित होने के सब बहाने वही घिसे -पिटे अफ़साने रह गए  क्या करें  उन्हें गर्व होता है उधर  और इधर लज़्ज़ा शरमा कर  अंधेरे घर की सबसे भीतरी कोठरी में  मोटे पर्दे के पीछे  सोने का स्वांग रचाती  है  सिसक सिसक कर हर रात रोती जाती है  लंबी -सी घूँघट के नीचे...