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वीडियो की बात

मित्रों,नमस्कार ।
एक लंबे अंतराल बाद यहाँ आना संभव हो पाया है । दरअसल आजकल अपनी बातों के संप्रेषण के कई माध्यम हैं ।समय के साथ साथ जैसे प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ़ लोगों का रूख हुआ ,उसी तरह अब पढने की बजाय कुछ लोग सुनने -देखने में ज़्यादा रुचि लेते हैं ।विदेशों की तरह भारत में भी वीडियो का प्रचलन बढ़ रहा है । मैं भी अब इस अधिक संप्रेषणीय माध्यम के सहारे अपनी बात अधिक लोगों तक पहुँचाने की छोटी कोशिश में लगी हूँ । कुछ मित्रों ने इसे सराहा है । आप भी इसे देखें- परखें।पसंद आए तो लाइक करें ,शेयर करें । मैंने यू ट्यूब पर एक चैनल बनाया है जिसमें अपनी अभिरुचि के अनुरूप साहित्य ,कला एवं प्रकृति के संयोजन का अपने सीमित साधनों में एक छोटा सा प्रयास है ।आप इसे सब्सक्राइब करेंगे तो मुझे प्रोत्साहन मिलेगा ।
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बड़े घर की लड़की

बड़े घर की लड़की  अब वह भी खेल सकती है भाई के सुंदर खिलौनों से  अब वह भी पढ़ सकती है भाई के संग महंगे स्कूल में  अब वह भी खुलकर हँस सकती है लड़कों की तरह  वह देखने जा सकती है दोस्तों के संग सिनेमा  वह जा सकती है अब काॅलेज के पिकनिक टुअर पर  वह रह सकती है दूर किसी महानगरीय हाॅस्टल में  वह धड़ल्ले इस्तेमाल कर सकती है फेसबुक, ह्वाट्सएप और ट्विटर  वह मस्ती में गा  और नाच सकती है फैमिली पार्टी में  वह पहन सकती है स्कर्ट ,जीन्स और टाॅप वह माँ - बाप से दोस्तों की तरह कर सकती है बातें  वह देख सकती है अनंत आसमान में उड़ने के ख़्वाब  इतनी सारी आज़ादियाँ तो हैं बड़े घर की लड़की  को  बस जीवनसाथी चुनने का अधिकार तो रहने दो  इज़्ज़त-प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी ऊँचे खानदान की  वैसे सब जानते हैं कि साँस लेने की तरह ही  लिखा है स्वेच्छा से विवाह का अधिकार भी  मानवाधिकार के सबसे बड़े दस्तावेज में ! ---------------------------------------------------

हारी नहीं नीरजा

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तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ क्या नाम दूँ  तुम्हें  दुर्योधन,दुःशासन या  कलियुग का कुलनाशक  नाम देने से भी क्या फ़र्क पड़ता है  पत्थरों  पर कहाँ असर होता है    तुम्हें तो लज्जा कभी नहीं आती  देवी की आराधना तुमने भी की होगी  क्या माँगा होगा गिड़गिड़ाकर उसके चरणों में  धन -बल या फिर कोई छल  देखी तो कभी होगी अलबम में  अपनी माँ की जवानी की तस्वीर  क्या तुम्हें वह सूरत उस वक़्त नज़र नहीं आती  जब अपने आसान 'शिकार'  पर हमला करते हुए  लज्जा कभी नहीं आती   तुम्हारी भी कोई बहन कहीं  बंद कमरे की घुटन तजकर  हर शाम की सुहानी हवा में  थोड़ी देर  आज़ाद चिड़िया बन जाना चाहती होगी  क्या तुमने कतर दिए हैं उसके सफेद पंख या बाँध दी हैं बेड़ियाँ उसके नाज़ुक पाँवों में तुम्हें अपनी स्वच्छंदता को झूठी मर्दानगी बताते हुए  लज्जा कभी नहीं आती  सुना है कि खत्म हो रहे हैं जंगल  और खत्म हो रहे हैं...