सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वाटरवाइफ़



         
वाटरवाइफ़ 
**************

ओ पानीबाई उर्फ वाटरवाइफ़ 
तुम्हारी आँखों में भी तो छलककर
आ जाता होगा पानी कभी -कभी 
या तुमने इसे अपनी नियति मान 
सारे पानी को सुखा लिया है 
रख अपने कलेजे पर पत्थर 

सुना है मैंने 
तुम्हारे अनोखे जीवन के बारे में जबसे 
तू क्या सोचती होगी 
आते -जाते लंबे रस्ते में 
यही सोच रही तबसे 
या सहेलियों के संग 
अपने दुख की गठरी तुम 
कुछ हल्का कर लेती होगी 

देखो न कितने ज़ख़्म भरे पड़े हैं 
धरती के भी अधेड़ वदन पर 
काटने को तैयार हैं सरकारी कुल्हाड़ियाँ
राजधानी में सोलह हज़ार दरख़्त 
उन दरख़्तों  की भी सुंदर कहानी रही होगी 
कुछ हँसते होठों और गीली आँखों की ज़िंदगानी होगी 
विकास के नाम पर उनकी भी अब कुर्बानी होगी 

सोचकर अक्सर हैरान होती हूँ मैं 
यह विकास नामक एलियन -सा जीव 
तुम्हारे गाँव जाकर कभी झाँकता क्यों नहीं 
दूर -दराज के कुओं -दरियाओं को 
तुम्हारे पास बुलाता क्यों नहीं 
कहीं तुम्हारा गाँव चंदा की नगरी से भी दूर तो नहीं 
उस जगह कोई 'चंद्रयान ' उड़कर  पहुँच जाता क्यों नहीं 
इन प्रश्नों के उमड़ते -घुमड़ते बादलों के बीच 
सफेद परियों से घिरी  मैं
हज़ारों कौतूहल वाला 
कोई अबोध बच्चा बन जाती हूँ 
परंतु मेरे प्रश्नों के सही जवाब गर परियाँ दे जातीं 
यक़ीनन इस ज़मीन के सारे दरिया 
तुम्हारे मटकों को लबालब भर देते 
तुम्हारी पथराई आँखों से मोती टपक जाते 
और तुम्हे  कोई वास्तविक दर्जा मिल जाता 
बिना किसी उपसर्ग के 
मेरी तरह 
तुम्हारे घर की  मटमैली दीवारों पर 
लिखी होतीं
केवल तुम्हारी ही कुछ सुनहरी 
ख़्वाहिशें  !
---------------------------------------------
-सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना,
24/06/2018 


*तस्वीर 'अमर उजाला 'से साभार 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बड़े घर की लड़की

बड़े घर की लड़की  अब वह भी खेल सकती है भाई के सुंदर खिलौनों से  अब वह भी पढ़ सकती है भाई के संग महंगे स्कूल में  अब वह भी खुलकर हँस सकती है लड़कों की तरह  वह देखने जा सकती है दोस्तों के संग सिनेमा  वह जा सकती है अब काॅलेज के पिकनिक टुअर पर  वह रह सकती है दूर किसी महानगरीय हाॅस्टल में  वह धड़ल्ले इस्तेमाल कर सकती है फेसबुक, ह्वाट्सएप और ट्विटर  वह मस्ती में गा  और नाच सकती है फैमिली पार्टी में  वह पहन सकती है स्कर्ट ,जीन्स और टाॅप वह माँ - बाप से दोस्तों की तरह कर सकती है बातें  वह देख सकती है अनंत आसमान में उड़ने के ख़्वाब  इतनी सारी आज़ादियाँ तो हैं बड़े घर की लड़की  को  बस जीवनसाथी चुनने का अधिकार तो रहने दो  इज़्ज़त-प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी ऊँचे खानदान की  वैसे सब जानते हैं कि साँस लेने की तरह ही  लिखा है स्वेच्छा से विवाह का अधिकार भी  मानवाधिकार के सबसे बड़े दस्तावेज में ! ---------------------------------------------------

हारी नहीं नीरजा

भारत की अशोक चक्र प्राप्त बिटिया नीरजा भनोट (7 सितंबर 1963 - 5 सितंबर 1986 ) के प्रति एक श्रद्धांजलि हारी नहीं नीरजा ******************** वह लड़की  हाँ, वो लड़ी शर्म के ख़िलाफ़ डर के ख़िलाफ़ परंपरा के ख़िलाफ़ दहेज के ख़िलाफ़ अपने 'प्रताड़क परमेश्वर' के ख़िलाफ़ ज़माने की प्रतिकूल हवाओं के ख़िलाफ़ वह जीतती गई एक -एक क़दम  नापती हुई ज़मीन और आकाश की दूरी अब नरपिशाचों की बारी थी उसके भीतर सूझबूझ की शांत नदी बह रही थी साहस भी अनंत आसमानी हो चला था और वह उस विशाल विमान में एक जुझारू जटायु बन लड़ती रही रावणों से पंख नुचकर जख़्म रिसते रहे जीतना उसका तय था पर मृत्यु उसे अपने प्यार की तरह  छीन ले गई झटककर बस कुछ ही समय पहले तो जन्मदिवस की गोद से  रंगीन सपनों -सी मोमबत्तियाँ बुझ गईं जलने से पहले ही पथरायी माँ का अनमोल उपहार मुँह बाए बैठा रहा प्रतीक्षारत इस बार भी वही जीती थी एक क्या तीन सौ से अधिक अशोक चक्र कुर्बान हो जाएंगे वो दहशत में मरकर पुन: जी उठी  देशी और फिरंगी ज़िन्दगियाँ जहाँ भी होंगी फल...

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ क्या नाम दूँ  तुम्हें  दुर्योधन,दुःशासन या  कलियुग का कुलनाशक  नाम देने से भी क्या फ़र्क पड़ता है  पत्थरों  पर कहाँ असर होता है    तुम्हें तो लज्जा कभी नहीं आती  देवी की आराधना तुमने भी की होगी  क्या माँगा होगा गिड़गिड़ाकर उसके चरणों में  धन -बल या फिर कोई छल  देखी तो कभी होगी अलबम में  अपनी माँ की जवानी की तस्वीर  क्या तुम्हें वह सूरत उस वक़्त नज़र नहीं आती  जब अपने आसान 'शिकार'  पर हमला करते हुए  लज्जा कभी नहीं आती   तुम्हारी भी कोई बहन कहीं  बंद कमरे की घुटन तजकर  हर शाम की सुहानी हवा में  थोड़ी देर  आज़ाद चिड़िया बन जाना चाहती होगी  क्या तुमने कतर दिए हैं उसके सफेद पंख या बाँध दी हैं बेड़ियाँ उसके नाज़ुक पाँवों में तुम्हें अपनी स्वच्छंदता को झूठी मर्दानगी बताते हुए  लज्जा कभी नहीं आती  सुना है कि खत्म हो रहे हैं जंगल  और खत्म हो रहे हैं...