सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ख़ूबसूरत

ख़ूबसूरत
********
वक़्त के साथ
बदल जाते हैं सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी
और अगर ग़ौर से देखो तो
बदल जाते हैं अपने अपने भगवान
और बदल जाते हैं उन्हें खुश करने के तरीके
फिर औरत तो हाड़ - मांस का आदिम टुकड़ा है न
ताउम्र सागर तलाशती बहती बावरी नदी का दुखड़ा है न
किसी ने जब अपनाया तो वह जान पाई कि वह भी ख़ूबसूरत है
तमाम दाग़-धब्बों के बावजूद वह भी चाँद की शायद मूरत है
हाँ, हो सकता है...तब वह परी दिखती रही हो
क्योंकि कहते हैं लोग कि पहली मुलाक़ातों में
अधिकांश औरतों के पास जादू की छड़ी होती है

वक़्त के दिए हर ज़ख्म को ढोया अपनी नाजुक पीठ पर
और चलती रही पगडंडियों और राजपथ पर वही हाथ थामे - थामे
नन्ही किलकारियों का सुख ढोना भी ज़िन्दगी का निहायत ज़रूरी हिस्सा था
आँखों के नीचे हर रोज़ बढ़ते काले पहाड़ पर  हांफकर चढ़ाई करके
रात और दिन के बीच लुढकते - चढ़ते  देह बन गई पुरानी  उघड़ती फुटबॉल
माथे पर लिख दिया अनवरत खेलती जिम्मेदारियों ने
कभी न मिटनेवाली अनगिनत झुर्रियों के भूतहा खौफ़नाक नाम
अब हर कोई माधुरी दीक्षित नहीं हो सकता न
बरसाती रहे कृपा बोटाॅक्स की झुर्रीहरण सूइयाँ
वह मोहिनी खिलखिलाती रहे सबके सपनों में आजीवन

फिर भी वह घरेलू औरत मानती है खुद को भी ख़ूबसूरत
और ओढ़ती है पतझड़ी पीले चितकबरे चेहरे पर
अपने बच्चों की सूरज से भी चमकदार मुस्कान
इस क्रम में याद नहीं रह पाता है हफ़्तों हफ़्तों
नाखूनों पर शक्ल बदलते मनहूस अमीबाओं को उतार फेंकना
और बिछाना फिर से चटक रंग की नई लुभावनी चादर किसी के लिए
हाँ, मुहल्ले के नुक्कड़ की ब्यूटी पार्लर वाली
जब भी मिल जाती है सब्जी का मोलभाव करते  समय
बतीसी दिखाती हुई मनुहार कर बैठती है
'करवा लो न आज भाभी जी फेशियल
तीस के बाद बांधती है त्वचा और पति को भी'
'नहीं अभी'.....मौज़ूद है समय न होने का सदाबहार बहाना
जानती है वह समय की आंच में धीमे धीमे अपने बाल पकाती
उतने पैसे में आ जाएगी अपनी गुड़िया की कोई सुंदर फ्राॅक
वैसे भी उसे याद रहता है अब भी उन हनीमूनी दिनों की बात
किसी ने भरोसा दिलाया था हाथ मज़बूती से थामकर
'ब्यूटी इज़न्ट स्कीन डिप् '
और वह इसी भरोसे के सहारे
पछाड़ती आई है दुनिया की तमाम ब्यूटी क्वीनों को
क्योंकि मन अभी भी है ज्यों का त्यों
बदल गई हो सारी दुनिया
बदल गई हो साथ ही
देह की कायनात !
- सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना
1 जुलाई, 2016
*************************







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बड़े घर की लड़की

बड़े घर की लड़की  अब वह भी खेल सकती है भाई के सुंदर खिलौनों से  अब वह भी पढ़ सकती है भाई के संग महंगे स्कूल में  अब वह भी खुलकर हँस सकती है लड़कों की तरह  वह देखने जा सकती है दोस्तों के संग सिनेमा  वह जा सकती है अब काॅलेज के पिकनिक टुअर पर  वह रह सकती है दूर किसी महानगरीय हाॅस्टल में  वह धड़ल्ले इस्तेमाल कर सकती है फेसबुक, ह्वाट्सएप और ट्विटर  वह मस्ती में गा  और नाच सकती है फैमिली पार्टी में  वह पहन सकती है स्कर्ट ,जीन्स और टाॅप वह माँ - बाप से दोस्तों की तरह कर सकती है बातें  वह देख सकती है अनंत आसमान में उड़ने के ख़्वाब  इतनी सारी आज़ादियाँ तो हैं बड़े घर की लड़की  को  बस जीवनसाथी चुनने का अधिकार तो रहने दो  इज़्ज़त-प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी ऊँचे खानदान की  वैसे सब जानते हैं कि साँस लेने की तरह ही  लिखा है स्वेच्छा से विवाह का अधिकार भी  मानवाधिकार के सबसे बड़े दस्तावेज में ! ---------------------------------------------------

हारी नहीं नीरजा

भारत की अशोक चक्र प्राप्त बिटिया नीरजा भनोट (7 सितंबर 1963 - 5 सितंबर 1986 ) के प्रति एक श्रद्धांजलि हारी नहीं नीरजा ******************** वह लड़की  हाँ, वो लड़ी शर्म के ख़िलाफ़ डर के ख़िलाफ़ परंपरा के ख़िलाफ़ दहेज के ख़िलाफ़ अपने 'प्रताड़क परमेश्वर' के ख़िलाफ़ ज़माने की प्रतिकूल हवाओं के ख़िलाफ़ वह जीतती गई एक -एक क़दम  नापती हुई ज़मीन और आकाश की दूरी अब नरपिशाचों की बारी थी उसके भीतर सूझबूझ की शांत नदी बह रही थी साहस भी अनंत आसमानी हो चला था और वह उस विशाल विमान में एक जुझारू जटायु बन लड़ती रही रावणों से पंख नुचकर जख़्म रिसते रहे जीतना उसका तय था पर मृत्यु उसे अपने प्यार की तरह  छीन ले गई झटककर बस कुछ ही समय पहले तो जन्मदिवस की गोद से  रंगीन सपनों -सी मोमबत्तियाँ बुझ गईं जलने से पहले ही पथरायी माँ का अनमोल उपहार मुँह बाए बैठा रहा प्रतीक्षारत इस बार भी वही जीती थी एक क्या तीन सौ से अधिक अशोक चक्र कुर्बान हो जाएंगे वो दहशत में मरकर पुन: जी उठी  देशी और फिरंगी ज़िन्दगियाँ जहाँ भी होंगी फल...

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ क्या नाम दूँ  तुम्हें  दुर्योधन,दुःशासन या  कलियुग का कुलनाशक  नाम देने से भी क्या फ़र्क पड़ता है  पत्थरों  पर कहाँ असर होता है    तुम्हें तो लज्जा कभी नहीं आती  देवी की आराधना तुमने भी की होगी  क्या माँगा होगा गिड़गिड़ाकर उसके चरणों में  धन -बल या फिर कोई छल  देखी तो कभी होगी अलबम में  अपनी माँ की जवानी की तस्वीर  क्या तुम्हें वह सूरत उस वक़्त नज़र नहीं आती  जब अपने आसान 'शिकार'  पर हमला करते हुए  लज्जा कभी नहीं आती   तुम्हारी भी कोई बहन कहीं  बंद कमरे की घुटन तजकर  हर शाम की सुहानी हवा में  थोड़ी देर  आज़ाद चिड़िया बन जाना चाहती होगी  क्या तुमने कतर दिए हैं उसके सफेद पंख या बाँध दी हैं बेड़ियाँ उसके नाज़ुक पाँवों में तुम्हें अपनी स्वच्छंदता को झूठी मर्दानगी बताते हुए  लज्जा कभी नहीं आती  सुना है कि खत्म हो रहे हैं जंगल  और खत्म हो रहे हैं...