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संदेश

विपथगा

विपथगा --------------------------------------------------------------------------------- बहुत -सी आवाज़ें  आ रही हैं बहुत भीड़ नज़र आ रही है गर्दन घुमाकर  देखती हूँ उत्सुकतावश सदियों से चल रही पंक्ति कहाँ तक पहुँची है पर अफ़सोस मुझे कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आ रहा है मनु नामक मूर्ति मुस्कुरा रही है उसकी संहिता का अनुपालन  बखूबी कर रही है वह भीड़ तलाश रही है आज भी सुपर मार्केट में रोटी पकाने के लिए तवा कोई गोल माथे पर चमकती  हुई  बिंदिया अनमोल होठों की महंगी सुर्ख लाली साथ में नई क्रीम गोरा बनाने वाली भीड़ बनी गतिहीन पर मुझे चाहिए गति.....और गति इसलिए भीड़ से विलगित पाँवों को मानकर गुरु  होगी साधना कोई साथ नहीं देगा पर निश्चय है यही मेरा नहीं बनना भीड़ का हिस्सा तवा के अलावा  रखना है पूरे ब्रह्माण्ड का हिसाब सामने है रात का स्याह अंधेरा छिप नहीं पा रही है इसमें नियति भीड़ की कैसे न करूँ भीड़ से अलग चलने की ज़िद जब मेरी मंज़िल बस दूसरी चाहरदीवार...
प्रार्थना नए साल पर --------------------------------------------------------------- काश ऐसा हो भगवान ,  घर आए  इस  नए साल में भूखों को निवाला मिले, सुबह-शाम यहाँ हर हाल में सुबह को निकले परिंदे ,सुरक्षित शाम को नीड़ लौटें बेटियों के चेहरे पर भी, सुबह -सी  रौनक  संग लौटे किसी भी शहर में ग़रीब कोई,  फुटपाथ पर न सोए किसी सिरफिरे की  गाड़ी,  कीड़े-मकोड़ों को न रौंदे कोख में किसी कन्या की,  अनसुनी चीख  न निकले घर और अस्पताल के,  कसाइयों का यूं दिल पिघले लड़का और लड़की  अब,  सचमुच बराबरी में ही  पले दहेज की आग में फिर से, किसी घर की लक्ष्मी न जले ---------×--------×--------×--------×--------×---------×------×-------

ज़िंदा रहेंगी कलियाँ

ज़िंदा रहेंगी कलियाँ --------------------------------------------- अब कलियाँ मुस्कुराती नहीं खुलकर डर है उनकी मुस्कुराहट देखकर आने वाले भौंरे बता देंगे उनका पता दुश्मनों को दुश्मन देख रहे मोबाइल और इंटरनेट की काली छवियां सीख रहे नन्हीं कलियों का भी दमन बनकर कुत्सित दरिंदे  निकलते गलियों में पहले ललचाएंगे-फुसलाएंगे छुपकर फिर तोड़ेंगे-मरोड़ेंगे सरेआम आंसुओं से गीली पंखुड़ियाँ बेज़ान बिखरी होंगी मुरझाई सरेराह मातम मनाएगा हमेशा की तरह  बाग का बूढ़ा माली हाथ पर हाथ धरे रह जाएगा फफक फफक कर रोएगा अपनी किस्मत पर डाल पर बैठी इंतज़ार करती कोयल का गला रुंध जाएगा सियासत सेकेंगी रोटियाँ गर्म तवे पर स्वयंसेवी देवियाँ धरने-प्रदर्शन की फोटो  खिचवाएंगी टूटी हुई कलियाँ ज़िंदा रहेंगी फिर भी बहुत गा लिया शोकगीत अपनी  असंख्य मौतों का लड़ेंगी  अपनी सांसों की ख़ातिर कई 'निर्भयाएं' पहनाएंगी दुश्मन के गले में  मृत्युदंड का हार बस मिल जाए अगर सभी...

कन्या पूजन के बहाने.....यह चुप रहने का समय है

मित्रों,  नवरात्रि एवं दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं।महाष्टमी के दिन गौरी पूजन हेतु बच्चियों की तलाश शुरू हो गई है.....मेरे मोहल्ले में ....और आपके मोहल्ले में भी...मेरे मोहल्ले में तो तीन -चार बच्चियाँ अभी कम पड़ रही हैं...उम्मीद है कि आपके यहाँ भी संख्या कम पड़ रही होगी. ...अब क्या करेंगे.... हर साल की तरह ....यही न कि आसपास की झुग्गी बस्ती से कन्याओं को बुलाएंगे...चलिए कम से कम ये झुग्गी बस्ती वाले किसी बात में हमसे अच्छे हैं. ....वे भले ही बेटे की चाह में आधा दर्जन बेटियाँ पैदा कर लेंगे. ...लेकिन बेटियों की गर्भ में पहचान कर... मारने की घटना  उनके यहां बहुत कम दिखती है..सीधी सी बात है. ..चोरी-छुपे लिंग परीक्षण और ...भ्रूण की हत्या करने में पैसे भी तो खर्च करने होंगे.                                 अब देखिये न....जैसे जैसे हमारी बेटियों की संख्या कम होती जा रही है. ...वैसे वैसे हम नए तर्क और बहाने भी गढ़ना सीख रहे हैं....पहले यह कहा जाता था कि बेटियों के दहेज के जुगाड़ की चिंता के कारण उन...

यह टूटने का समय न था

यह टूटने का समय न था -------------------------------------------------------- डाल से टूटी हुई पत्ती थी मैं डाल को लेकिन कोई ग़म न था स्पर्श अभी स्निग्ध था और रंग भी हरा - हरा असमय ऐसे टूटकर  बिछड़ना था बिछड़ गई हवाओं ने जब जी चाहा तूफ़ानों का शक्ल अख्तियार किया फ़िज़ाओं में भटकती थपेड़े खाकर पीली हुई डाल की ओर तरसते नेत्रों से देखा पर वहाँ अजनबीपन से भरा गहरा सन्नाटा पसरा था मैंनें खुद को समझाया कि मेरी पहचान बदल गई थी और मैं तो कब की मार दी गई थी  मेरी चीखें कैसे सुन सकते थे वे जिन्होंने बोलने से पहले ही मेरी ज़बान काट ली थी यही तो दुनिया का उसूल है टूटी हुई पत्ती भला  जुड़ती है कभी डाल से ! - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना 09.10.2015

ओह ......ये कामवालियाँ !

ओह...ये कामवालियाँ ! दाई...बाई ...या कहो कामवालियाँ वो देखो आ रहीं हैं सुबह- सुबह अपने हाथों को भांजकर  जोर- जोर से बतियाते अपनी अलग -सी पहचान लिए अपनी कछुए वाली पीठ  पर कई आकाश ढोते हुए । ×     ×    ×     ×    ×    ×    × उन्हें देखते ही मेमसाहबों के चेहरे खिल जाते हैं इत्मीनान है चलो आ तो गईं निपट जाएंगे झाड़ू-पोंछा, बर्तन और अलग से भी कुछ काम मक्खियों की भिनभिनाहट तो होगी रोज़ की तरह ×   ×     ×     ×    ×      ×     × आते ही कामवालियाँ फटाक से घुस जाती हैं ' पवित्र ' रसोईघर में बर्तनों पर छूट गए साबुन के दाग़ से डाँट भी खाती हैं कभी चुप रहती हैं कभी उबल पड़ती  हैं चूल्हे पर चढ़ी चाय के साथ ×   ×     ×     ×    ×      ×     × बरामदे से शुरू कर घर  के आखिरी कमरे तक पोंछा लगाती जाती हैं पर उन घरों के बाथरूम ...

सरकारी स्कूल की लड़कियाँ

सरकारी स्कूल की लड़कियाँ _____________________________ सफेद कमीज़ और गहरे आसमानी स्कर्ट पहने भागी जा रही हैं ठीक दस बजे सरकारी स्कूल की लड़कियाँ उनके जूते ठीक - ठाक हैं लगभग पर मोजे थोड़े गंदे और चुन्नटों के संग थोड़े ढीले-ढाले इस सुबह ही शाम की पीली थकान ओढ़े। कुछ सालों पहले भी नहीं दिखती थीं लड़कियाँ उतनी ' वेल ड्रेस्ड ' बांधनी होती थी सिर पर लाल रिबन से तेल चुपड़े बालों की चोटी फिर भी पास से गुज़रती हुई अंग्रेज़ी नॉवेल की शौक़ीन कान्वेंटी लड़कियाँ नाक-भौं सिकोड़ती चिढ़ा जातीं अनायास सरकारी स्कूल की लड़कियाँ कुछ देर तक अपने कपड़ों में ढूंढती रह जातीं क्रीज अपनी ही बोली से आने लगती देहातीपन की बू उनके कंधे झुक जाते थे कुछ और 'शहजादियाँ' तनी-तनी माॅडलों-सी खिलखिलाती हुई दूर तक नज़र आतीं। अब नहीं जाती हैं मध्यवर्गीय लड़कियाँ सरकारी स्कूलों में पर वे जाती हैं जिनके लिए बड़े सपने देखना अब भी है गुनाह उनके माता- पिता नहीं चुका सकते स्मार्ट ज्ञान की कीमत इसलिए सरकारी स्कूल की लड़कियों के मोजे अब भी हैं मटमैले और थोड़े ढीले-ढाले प...