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सरकारी स्कूल की लड़कियाँ

सरकारी स्कूल की लड़कियाँ
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सफेद कमीज़ और गहरे आसमानी स्कर्ट पहने
भागी जा रही हैं
ठीक दस बजे
सरकारी स्कूल की लड़कियाँ
उनके जूते ठीक - ठाक हैं लगभग
पर मोजे थोड़े गंदे
और चुन्नटों के संग
थोड़े ढीले-ढाले
इस सुबह ही
शाम की पीली थकान ओढ़े।

कुछ सालों पहले भी
नहीं दिखती थीं लड़कियाँ
उतनी ' वेल ड्रेस्ड '
बांधनी होती थी सिर पर
लाल रिबन से
तेल चुपड़े बालों की चोटी
फिर भी
पास से गुज़रती हुई
अंग्रेज़ी नॉवेल की शौक़ीन
कान्वेंटी लड़कियाँ
नाक-भौं सिकोड़ती
चिढ़ा जातीं अनायास
सरकारी स्कूल की लड़कियाँ
कुछ देर तक
अपने कपड़ों में ढूंढती रह जातीं क्रीज
अपनी ही बोली से आने लगती
देहातीपन की बू
उनके कंधे झुक जाते थे कुछ और
'शहजादियाँ' तनी-तनी
माॅडलों-सी खिलखिलाती हुई
दूर तक नज़र आतीं।

अब नहीं जाती हैं
मध्यवर्गीय लड़कियाँ सरकारी स्कूलों में
पर वे जाती हैं
जिनके लिए बड़े सपने देखना
अब भी है गुनाह
उनके माता- पिता नहीं चुका सकते
स्मार्ट ज्ञान की कीमत
इसलिए सरकारी स्कूल की लड़कियों के मोजे
अब भी हैं मटमैले
और थोड़े ढीले-ढाले
पर उनके चेहरे
अधखिले दिवास्वप्न की तरह
बेहद भोले-भाले !
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********---सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना
                   (13 मार्च , 2004 को रचित)***************



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