सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

विंडो शॉपिंग

विंडो शॉपिंग
~~~~~~~~~~~~~~

 फेसबुक पर  स्त्रियाँ  जो 

हाय ,हलो या बेवज़ह चैटिंग का 

नहीं देती जवाब 

सनकी और घमंडियाँ  होती हैं 

फेसबुक पर स्त्रियाँ जो 

नहीं देती किसी पुरुष से जुड़ी अपनी पहचान 

टूटे हुए घर की 

बदमिज़ाज बदलियाँ  होती हैं 

फेसबुक पर स्त्रियाँ जो    

बदलती हैं रोज़ अपनी तस्वीरें  

बदचलन टाइप की 

आवारा तितलियाँ होती हैं 

फेसबुक पर स्त्रियाँ जो  

खाना - पकाना डालती हैं  

उन्हें आता -जाता क्या है 

बस बहनजीवालियाँ  होती हैं 

फेसबुक पर स्त्रियाँ जो 

तीखी ज़बान चलाती 

मर्दों की सामंती सत्ता को ललकारती हैं  

वे मूर्ख  परकटियाँ  होती हैं  

हाँ, यही कहा करते हैं  मर्द वे 

जिनकी खुद की स्त्रियाँ  

नहीं होती हैं फेसबुक पर 

या जिन्हें उनके नहीं होने का 

सुंदर भ्रम  होता है  


सचमुच, उनके लिए  

फेसबुक की सारी स्त्रियाँ  

चमचमाते भूमंडलीकृत बाज़ार  में  

'विंडो शॉपिंग ' का मज़ा देती हैं ....


सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना   03/08/2016


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बड़े घर की लड़की

बड़े घर की लड़की  अब वह भी खेल सकती है भाई के सुंदर खिलौनों से  अब वह भी पढ़ सकती है भाई के संग महंगे स्कूल में  अब वह भी खुलकर हँस सकती है लड़कों की तरह  वह देखने जा सकती है दोस्तों के संग सिनेमा  वह जा सकती है अब काॅलेज के पिकनिक टुअर पर  वह रह सकती है दूर किसी महानगरीय हाॅस्टल में  वह धड़ल्ले इस्तेमाल कर सकती है फेसबुक, ह्वाट्सएप और ट्विटर  वह मस्ती में गा  और नाच सकती है फैमिली पार्टी में  वह पहन सकती है स्कर्ट ,जीन्स और टाॅप वह माँ - बाप से दोस्तों की तरह कर सकती है बातें  वह देख सकती है अनंत आसमान में उड़ने के ख़्वाब  इतनी सारी आज़ादियाँ तो हैं बड़े घर की लड़की  को  बस जीवनसाथी चुनने का अधिकार तो रहने दो  इज़्ज़त-प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी ऊँचे खानदान की  वैसे सब जानते हैं कि साँस लेने की तरह ही  लिखा है स्वेच्छा से विवाह का अधिकार भी  मानवाधिकार के सबसे बड़े दस्तावेज में ! ---------------------------------------------------

हारी नहीं नीरजा

भारत की अशोक चक्र प्राप्त बिटिया नीरजा भनोट (7 सितंबर 1963 - 5 सितंबर 1986 ) के प्रति एक श्रद्धांजलि हारी नहीं नीरजा ******************** वह लड़की  हाँ, वो लड़ी शर्म के ख़िलाफ़ डर के ख़िलाफ़ परंपरा के ख़िलाफ़ दहेज के ख़िलाफ़ अपने 'प्रताड़क परमेश्वर' के ख़िलाफ़ ज़माने की प्रतिकूल हवाओं के ख़िलाफ़ वह जीतती गई एक -एक क़दम  नापती हुई ज़मीन और आकाश की दूरी अब नरपिशाचों की बारी थी उसके भीतर सूझबूझ की शांत नदी बह रही थी साहस भी अनंत आसमानी हो चला था और वह उस विशाल विमान में एक जुझारू जटायु बन लड़ती रही रावणों से पंख नुचकर जख़्म रिसते रहे जीतना उसका तय था पर मृत्यु उसे अपने प्यार की तरह  छीन ले गई झटककर बस कुछ ही समय पहले तो जन्मदिवस की गोद से  रंगीन सपनों -सी मोमबत्तियाँ बुझ गईं जलने से पहले ही पथरायी माँ का अनमोल उपहार मुँह बाए बैठा रहा प्रतीक्षारत इस बार भी वही जीती थी एक क्या तीन सौ से अधिक अशोक चक्र कुर्बान हो जाएंगे वो दहशत में मरकर पुन: जी उठी  देशी और फिरंगी ज़िन्दगियाँ जहाँ भी होंगी फल...

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती

तुम्हें लज्जा कभी नहीं आती  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ क्या नाम दूँ  तुम्हें  दुर्योधन,दुःशासन या  कलियुग का कुलनाशक  नाम देने से भी क्या फ़र्क पड़ता है  पत्थरों  पर कहाँ असर होता है    तुम्हें तो लज्जा कभी नहीं आती  देवी की आराधना तुमने भी की होगी  क्या माँगा होगा गिड़गिड़ाकर उसके चरणों में  धन -बल या फिर कोई छल  देखी तो कभी होगी अलबम में  अपनी माँ की जवानी की तस्वीर  क्या तुम्हें वह सूरत उस वक़्त नज़र नहीं आती  जब अपने आसान 'शिकार'  पर हमला करते हुए  लज्जा कभी नहीं आती   तुम्हारी भी कोई बहन कहीं  बंद कमरे की घुटन तजकर  हर शाम की सुहानी हवा में  थोड़ी देर  आज़ाद चिड़िया बन जाना चाहती होगी  क्या तुमने कतर दिए हैं उसके सफेद पंख या बाँध दी हैं बेड़ियाँ उसके नाज़ुक पाँवों में तुम्हें अपनी स्वच्छंदता को झूठी मर्दानगी बताते हुए  लज्जा कभी नहीं आती  सुना है कि खत्म हो रहे हैं जंगल  और खत्म हो रहे हैं...