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सुनो बालिके ...सुनो !

   सुनो बालिके ....सुनो ! ********************** बधाई तुम्हें  कि इस दुनिया में  तुम आ ही गई  पर इस खुशी को संभालने की ख़ातिर  सीखने होंगे कई नए पाठ अभी तो यह पहला व्यूह था  बाक़ी हैं कठिनतर सफ़र पार करना होगा  समूचा चक्रव्यूह  चलो अच्छा है  अभी तुम्हारे खेलने - खाने के दिन हैं तुम बहुत खुश लग रही हो  अपने रंगबिरंगे किचेन सेट में  दाल -भात ,रोटी और चाय के अलावा पिज्जा -बर्गर भी पकाकर  और अपने इस खेल में मम्मी -पापा को झूठमूठ का परोसकर  तुम इतरा रही हो  पर रूको अभी देखो  इसके आगे कई मुक़ाम हैं तुम भी खेलो कमरे से निकालकर बाहर अपने पाँव रखो रनों का हिसाब  चोट करो शटल पर संतुलन साध घरेलू बिल्ली से ही प्यार मत बढ़ाओ  सीखो शेरनी से दहाड़ पूरी दुनिया है सियासत  बिछी शतरंज की बिसात   चलता रहता शह और मात  दिन हो या रात  अरे बालिके  मत रचाओ गुड्डे - गुड़ियों का ब्याह राजकुमारी बनकर मत घूमो परीलोक का छद्म संसार  मत बुनो सुनहरे ख्वाब अप...

बेंगलुरू ! हम शर्मिंदा हैं

हर कली या फूल के साथ काँटें भी होने चाहिए ताकि यूं ही कोई मसल कर छुट्टा सांढ इतराता  चला न जाए  बहुत अजीब समय है कि हर माली दहशत में है  माथे पे उनके ये गहरी शिकन है   क्या कलियों का खिलना गुनाह है या उनका खुलकर खिलखिलाकर हँसना  सोचो न कलियाँ खिलना बंद कर दें तो  दुनिया मरघट की खामोशी ओढ़कर कितनी सिकुड़ जाएगी  उस 'नैनो वर्ल्ड ' में किसी खुशबू और रंग की परिकल्पना  क्या कवियों के वश की बात है  या फिर ज्योतिषी बता सकते हैं गणना कर  कि सृष्टि इन कलियों के बिना ज़िंदा रह सकेगी कितने बरस  माँ के बिना नवजात संतान की परवरिश कहाँ आसान होती है  जिन्होंने नहीं सुना ऐसा अभागे बच्चों का रोना  उनकी मूर्खता को सलाम   पर अब वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ताओं से कह दो  बनाएं जब भी नई पौध आधुनिक प्रयोगशालाओं में  कलियों को बस बेहतरीन रंग और खुशबू न  दें  छुरीले मारक काँटों का साथ भी ज़रूर दें  अगर दुनिया बचानी है ......... -सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना   

अपने समय से आगे एक सावित्री

अपने समय से आगे एक सावित्री ------------------------------------------------ बचपन में उसे अपने घर में मिली एक अंग्रेजी की किताब......उसने उत्सुकतावश जब उसके पन्नों को पढ़ने की चेष्टा की....तब पिता ने चिढ़कर किताब को खिड़की से बाहर फेंक दिया....पर उसका उत्साह खत्म नहीं हुआ. ...तमाम विरोधों के बावजूद पढ़ाई के प्रति ललक खत्म नहीं हुई.....हाँ, उसकी इच्छा तभी पूरी हो पाई जब उसका विवाह हुआ. ...वह भी एक ऐसे महात्मा से जो स्वयं शिक्षा को मनुष्य का सबसे बड़ा हथियार मानता था....फिर क्या था. ..वह उनकी शिष्या बनी और पढ़ पाने की पुरानी ज़िद्द पूरी हुई....पर उसका सफ़र यहीं नहीं रूका....उन्नीसवीं सदी के उस घोर कूपमंडूक समाज में ...जहाँ स्त्रियों की शिक्षा के बारे में सोचना भी पाप था...शिक्षा की मशाल को न केवल जलाया वरन् उसे कभी बुझने न दिया...पूना में विभिन्न जाति-धर्म की नौ लड़कियों को ले कर पहला कन्या पाठशाला खोला ...फिर अपने पति के सहयोग से विभिन्न स्थानों पर 18 स्कूल खोले....इस क्रम में उसे तत्कालीन समाज से कितना प्रतिरोध झेलना पड़ा होगा....यह सोचने की बात है. ...सचमुच...स्क...

गुब्बारे दीवारों से टंगे हुए

सभी मित्रों -पाठकों को नववर्ष की हार्दिक  शुभकामनाएं ! प्रस्तुत है इस  वर्ष  की प्रथम कविता इस ब्लॉग पर ।अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराते रहें।धन्यवाद । गुब्बारे दीवारों से टंगे हुए ******************* दो शब्द तारीफ़ों के अगर मिल जाते  मन इंद्रधनुष के सप्तरंगों पर सैर कर आता दिनभर के खालीपन में  कोई प्राणवायु भरकर संजीवनी मिल जाती हर शाम गुब्बारे खिल-खिल जाते  चाँद -सितारों से जा टकराते चाँदनी लिख जाती  काले स्लेट पर मोतियों की गुथी कोई सुंदर वर्णमाला  नन्हे बच्चे तोतली भाषा में सीखते  बार -बार दोहराते हम भी याद कर लेते फिर से वही प्रेमगीत  जिसे वर्षों से नहीं गाया गया नून -तेल के जुगाड़ में  घोंसले के बचाव में  दौड़ते हुए पाँवों  की थकान में  चलो न  सीखे फिर से ककहरा  कि गुम हो गई हैं हृदय से निकली लाखों शब्दावलियाँ बाज़ार में सस्ते सामान की तलाश में  जोड़घटाव गुणाभाग  मोलभाव करते पूरी पृथ्वी तीन  डगों में नापकर  इत्मीनान का स्वांग  रचते -रचते !...

घर या मकड़जाल का एक परिचित किस्सा

घर या मकड़जाल का एक परिचित किस्सा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ वो बना सकती है जंगल के वीराने में भी सुंदर बोलता हुआ घर इस कोने से या उस कोने से आगे से या पीछे की तरफ़ से जैसे भी देखोगे उसका हुनर बोलेगा खिड़कियों पर सजा होगा उसकी पसंद का गुलाबी या जामुनी फूलों वाला पर्दा जिसे अपने ख़्वाबों में टाँकना बचपन में ही वह सीख लेती है घर की खिड़कियों से आती है कभी बहुत शांत नदी से चलकर हवा और उसके खुले बाल इतरा उठते हैं तो कभी बंगाल के समंदर से उठा तूफ़ान पर्दों को झकझोर के रख देता है फिर भी वो खिड़कियाँ खुली रहती हैं हरदम उन्हीं से तो आ जाता है  मिलने चाँद आकाश के बहुत नर्म बिस्तर  से भी उठकर किसी रात पर क्या करे दिन में विद्रोही सूरज का तमतमाया लाल चेहरा भी उसे उतना ही भाता है वह गुनगुनाती है कुछ गिनी -चुनी चाँदनी रातों में कोई मधुर मिलन गीत बाक़ी दिन गूंगी दीवारों पर लाल स्याही से लिखती रहती है ऐसे ख़ामोश गीत जो अक्सर दफन हो जाते हैं अनारकली की बेबसी के साथ दीवारों की बंजर देह में छोड़ो  तुम भी कहाँ भटक गये मकड़ी हो या औरत बनाती ह...

एक और इंदिरा. ......

एक और इंदिरा........ ------------------------------------------------------------- 19 नवंबर 2012.....बिहार के प्रसिद्ध छठ पर्व के सायंकालीन पहले अरग का दिन.....ऑपरेशन थियेटर में ऑपरेशन से पूर्व इसकी तैयारी करने वाले स्टाफ.....जच्चा का उत्साह वर्धन कर रहे थे....अपने काम के साथ साथ. ...'अच्छा आप रेडियो में काम करते हो'......आर जे हो ?.....नहीं ,न्यूज रीडर हूँ. ...ओके, कभी हमें भी ले चलिए.....ये दूसरा बेबी है ? हाँ....पहले से गर्ल चाइल्ड है? हाँ.........आज आपके यहाँ का पर्व है न ? देखना आपको बेटा होगा......और उसने बिना कुछ कहे मुस्कुरा दिया हल्के से।                 हल्की सी चेतना के बीच.... ऑपरेशन सक्सेस होने की सूचना मिली.....पर एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया.....बात क्या है......किसी ने मुझे औपचारिक सूचना नहीं दी....बेबी स्वस्थ तो है न....उसी हालत में मुझे तरह तरह की आशंका होने लगी...पर पूछा नहीं पा रही थी पीठ के बल लेटे हुए.....शरीर के साथ होठ भी असमर्थ हो गये थे शायद....कुछ देर बाद सन्नाटे का रहस्य आखिर खुल ही गया.....सामने मेरी आँखों के ....

बीती सदी का बचपन और हमारे हिस्से के खेल

बीती सदी का बचपन और हमारे हिस्से के खेल ---------------------------- उन  दिनों चाँद सितारों जड़ित खुला आसमान 'उनके' लिए था हमारे हिस्से में चूड़ियों के भीतर की परिधि का विधान था जन्म लेते ही निर्धारित हो चुके थे ज़िन्दगी के अनगिनत चक्रव्यूही फेरे सजाए गए घरौंदे में दिखलाए गए सुंदर चाहरदीवारियों के लंबे घेरे गुड्डे- गुड़ियों के खेल में समाहित थे रसोई के काम कराए गए ज़िंदा गुड़ियों को कड़ाही-कलछी की पहचान हर दिन संस्कारों  की निकलती थी नई परिभाषा खेलकूद में हिस्से को तरसती रहीं दिन ब दिन निखरतीं गृहशोभा रातों को उड़ती रहीं देखकर चिड़ियों की लंबी उड़ान उजालों की सड़क पर  सायकिल चलाना भी था अपराध उस समय अपने हिस्से के खेल सिर्फ़ खेल थे कठपुतलियाँ कहाँ जानती हैं उंगलियों का मकसद बाद में जब होश आ ही गया घड़ी की सूइयों की बुढ़िया चाल में तब जवां चाबियों ने खोले बंद खंडहरों के राज़ कि क्लास में फर्स्ट आने से ज़्यादा क्यों मिलती थी शाबाशी बेसन के हलवे ठीकठाक बना लेने पर और यह रहस्य भी कि लड़कियों के खिलौने क्यों होते थे अलग बंदूकों, गाड़ियों और हेलीकॉप्...